क्या विकलांगता अभिशाप है?
क्या विकलांगता अभिशाप है?
क्या विकलांगता कोई बोझ है,
या समाज की आँखों का खोज है?
हम भी तो इंसान हैं प्यारे,
क्यों समझे जाएँ हम बेचारे?
न ये जीवन कोई अभिशाप है,
न ही कोई श्रापित ताप है।
हर साँस में उम्मीदों की लौ,
हर कदम में संकल्प की थाह।
हेलेन केलर—न देख सकीं, न सुन सकीं,
फिर भी दुनिया को शब्दों में गुन सकीं।
स्टीफन हॉकिंग—शरीर ने साथ छोड़ा,
पर ब्रह्मांड का राज़ सबके आगे खोला।
जो देख न पाए, क्या वो कम है?
उसकी संवेदनाएँ तो असीम हैं।
जो चल न सके, क्या वो थम गया?
उसका हौसला तो ऊँचाइयों को छू गया।
हमें न चाहिए दया की भीख,
बस चाहिए अधिकारों की सीख।
ना छीनो हक हमें जीने का,
ना बाँधो हौसला उड़ने का।
कला, विज्ञान, राजनीति में,
हम भी चमके हैं धरती के तारे।
तो मान लो इस सच्चाई को,
विकलांगता नहीं अभिशाप,
ये है हमारी पहचान—खास और न्यारी।
रचनाकार – अरुण कुमार सिंह
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