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"शस्त्र और शास्त्र जिनके लिए वर्जित थे?"

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शस्त्र और शास्त्र जिनके लिए वर्जित थे छीन लिए गए उनसे हर अधिकार, जन्म से पहले ही तय कर दी गई थी हार। ना कलम पकड़ने की आज़ादी, ना तलवार उठाने की इजाज़त। शब्दों के दरवाज़े बंद कर दिए गए, ज्ञान के दीप अंधेरे में रख दिए गए। बचपन से ही सिखाया गया झुकना, सपनों से पहले ही कह दिया – रुकना। वो थे मनुष्य, पर गिने नहीं गए, हिस्से में अपमान, पर इज्ज़त नहीं दी गई। जिन्होंने धरती जोती, फसल उगाई, पर थाली में पहले निवाला उन्हें नहीं मिल पाई। ना वेद पढ़ने का हक़, ना वीणा छूने का अधिकार, ना मंदिर का रास्ता, ना स्कूल का प्यार। कहा गया – "तुम केवल सेवा के लिए जन्मे हो," मानव होकर भी, मानवीयता से वंचित क्यों? लेकिन इतिहास चुप नहीं रहता, कभी न कभी सवाल करता है। वो उठे – कलम लेकर, किताब लेकर, कुछ ने तलवार, कुछ ने विचार लेकर। अब वो खुद अपने इतिहास के लेखक हैं, शस्त्र भी उनके हैं, शास्त्र भी उनके हैं। जो वर्जित था, वो अब अधिकार बनेगा, सदियों की चुप्पी अब हुंकार बनेगा। रचनाकार- अरुण कुमार सिंह 

क्या विकलांगता अभिशाप है?

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क्या विकलांगता अभिशाप है? क्या विकलांगता कोई बोझ है, या समाज की आँखों का खोज है? हम भी तो इंसान हैं प्यारे, क्यों समझे जाएँ हम बेचारे? न ये जीवन कोई अभिशाप है, न ही कोई श्रापित ताप है। हर साँस में उम्मीदों की लौ, हर कदम में संकल्प की थाह। हेलेन केलर—न देख सकीं, न सुन सकीं, फिर भी दुनिया को शब्दों में गुन सकीं। स्टीफन हॉकिंग—शरीर ने साथ छोड़ा, पर ब्रह्मांड का राज़ सबके आगे खोला। जो देख न पाए, क्या वो कम है? उसकी संवेदनाएँ तो असीम हैं। जो चल न सके, क्या वो थम गया? उसका हौसला तो ऊँचाइयों को छू गया। हमें न चाहिए दया की भीख, बस चाहिए अधिकारों की सीख। ना छीनो हक हमें जीने का, ना बाँधो हौसला उड़ने का। कला, विज्ञान, राजनीति में, हम भी चमके हैं धरती के तारे। तो मान लो इस सच्चाई को, विकलांगता नहीं अभिशाप, ये है हमारी पहचान—खास और न्यारी। रचनाकार – अरुण कुमार सिंह

मैं विकलांग हूं, लोग कहते हैं पर..!

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मैं विकलांग हूं, लोग कहते हैं पर..! मैं विकलांग हूं, लोग कहते हैं पर, हौसलों के पंख हैं मेरे, क्यों झुकूं मैं डर? राहों में कांटे मिले, फिर भी मुस्कुराया, गिरा, संभला, खुद को और मजबूत बनाया। जो सोचते थे, मैं थम जाऊंगा, वक्त ने दिखाया, मैं खुद की राह बनाऊंगा। पैरों से नहीं, इरादों से चलता हूं, हर मुश्किल को ताकत में बदलता हूं। हाथ थमे तो क्या, कलम अब भी चलती है, सपने मेरे मेहनत से हर रोज निकलती है। दीवारों को तोड़ना मेरी फितरत है, संघर्ष ही मेरी असली दौलत है। हवा भी पूछे, "तेरी ताकत क्या है?" मैं कहूं, "मेरे हौसले की हर बात निराली है।" मैं रुकने वालों में नहीं, जोश मेरा कम नहीं, मैं वो चिंगारी हूं, जो कभी बुझती नहीं। मत कहो मुझे असहाय, मैं सबल हूं, खुद से लिखी तकदीर का अटल संकल्प हूं। मैं हारा नहीं, मैं झुका नहीं, मैं अपने सपनों की उड़ान हूं, मैं खुद एक पहचान हूं! रचनाकार - अरूण कुमार सिंह