"शस्त्र और शास्त्र जिनके लिए वर्जित थे?"
शस्त्र और शास्त्र जिनके लिए वर्जित थे छीन लिए गए उनसे हर अधिकार, जन्म से पहले ही तय कर दी गई थी हार। ना कलम पकड़ने की आज़ादी, ना तलवार उठाने की इजाज़त। शब्दों के दरवाज़े बंद कर दिए गए, ज्ञान के दीप अंधेरे में रख दिए गए। बचपन से ही सिखाया गया झुकना, सपनों से पहले ही कह दिया – रुकना। वो थे मनुष्य, पर गिने नहीं गए, हिस्से में अपमान, पर इज्ज़त नहीं दी गई। जिन्होंने धरती जोती, फसल उगाई, पर थाली में पहले निवाला उन्हें नहीं मिल पाई। ना वेद पढ़ने का हक़, ना वीणा छूने का अधिकार, ना मंदिर का रास्ता, ना स्कूल का प्यार। कहा गया – "तुम केवल सेवा के लिए जन्मे हो," मानव होकर भी, मानवीयता से वंचित क्यों? लेकिन इतिहास चुप नहीं रहता, कभी न कभी सवाल करता है। वो उठे – कलम लेकर, किताब लेकर, कुछ ने तलवार, कुछ ने विचार लेकर। अब वो खुद अपने इतिहास के लेखक हैं, शस्त्र भी उनके हैं, शास्त्र भी उनके हैं। जो वर्जित था, वो अब अधिकार बनेगा, सदियों की चुप्पी अब हुंकार बनेगा। रचनाकार- अरुण कुमार सिंह