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🌍 NDMA की समावेशी कार्ययोजना – अब आपदा प्रबंधन विकलांगजन के साथ और उनके लिए! ♿🌀

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🌍 NDMA की समावेशी कार्ययोजना – अब आपदा प्रबंधन विकलांगजन के साथ और उनके लिए! ♿🌀 4–5 जून 2025 को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) में आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला "Strengthening Disability-Inclusive Disaster Preparedness & Humanitarian Action" के दौरान एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी कार्ययोजना प्रस्तुत की गई, जो विकलांगजन के दृष्टिकोण से आपदा प्रबंधन को पूरी तरह समावेशी बनाने की दिशा में मील का पत्थर है। 🔹 "Disability-Inclusive Disaster Risk Reduction War Room" की स्थापना का निर्णय 🔹 हर राज्य और ज़िले में PwD-Inclusive मॉक ड्रिल अनिवार्य 🔹 UDID, जनगणना, NFHS जैसे स्रोतों से विकलांगता आधारित डेटा का समावेश 🔹 नीतिगत निर्णयों में विकलांगजन और उनके संगठनों की भागीदारी सुनिश्चित 🔹 सांकेतिक भाषा, ब्रेल, चित्रों व ऑडियो फॉर्मेट में IEC सामग्री का विकास 🔹 मॉक ड्रिल में PwDs की सक्रिय भागीदारी व उनके लिए सुलभ फीडबैक प्रणाली 📅 अगले 90 दिनों में NDMA द्वारा प्रस्तावित प्रमुख कार्य: ✅ टूलकिट का निर्माण ✅ 3 राज्यों में पायलट मॉक ड्रिल ✅ समेक...

युद्ध की आग में विकलांग जन – उपेक्षित और अनदेखी चुनौती

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वर्तमान में भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते संघर्ष ने एक बार फिर सीमा क्षेत्रों में नागरिकों के लिए एक भयावह स्थिति उत्पन्न कर दी है। कश्मीर, पंजाब, राजस्थान और गुजरात जैसे संवेदनशील इलाकों में बमबारी, सैन्य संघर्ष और आतंकवाद के प्रभाव से न केवल सामान्य नागरिकों की सुरक्षा खतरे में है, बल्कि विकलांग जनों की स्थिति और भी जटिल हो गई है। युद्ध के दौरान विकलांग व्यक्तियों की सुरक्षा, सहायता और चिकित्सा सेवाओं की उपेक्षा एक गंभीर मानवीय संकट बनकर उभरती है। विकलांग जनों की उपेक्षा: वर्तमान संघर्ष में विकलांग जनों के लिए परिस्थितियाँ और भी कठिन हो गई हैं। बमबारी और हमलों के दौरान उनके पास बुनियादी सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं होती। न तो व्हीलचेयर उपयोगकर्ताओं के लिए सुरक्षित मार्ग होते हैं, न ही संकेत भाषा जानने वाले स्वयंसेवकों की व्यवस्था होती है, और न ही राहत शिविरों में समुचित सहायक उपकरण की व्यवस्था होती है। कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां विकलांग व्यक्तियों को आपातकालीन परिस्थितियों में सही समय पर राहत नहीं मिल पाई, और उनका जीवन और भी कठिन हो गया। हालांकि, किसी ठोस रिपोर्ट में यह नहीं ...

"दृष्टिहीनता नहीं, बल्कि दृष्टिकोण मायने रखता है" — मनू गर्ग (IAS) की प्रेरक यात्रा

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"दृष्टिहीनता नहीं, बल्कि दृष्टिकोण मायने रखता है" — मनू गर्ग (IAS) की प्रेरक यात्रा "जब इरादे बुलंद हों तो राहें खुद-ब-खुद बन जाती हैं।" इस कहावत को सच्चाई में बदल कर दिखाया है मनू गर्ग ने, जिन्होंने UPSC 2024 में ऑल इंडिया रैंक 91 हासिल कर यह सिद्ध कर दिया कि दिव्यांगता किसी भी लक्ष्य को पाने की राह में बाधा नहीं बन सकती। राजस्थान के रहने वाले मनू गर्ग ने कक्षा 8 में अपनी दृष्टि एक दुर्लभ आनुवंशिक रोग के कारण खो दी थी। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। एक दृष्टिबाधित छात्र होते हुए भी, उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से इतिहास और राजनीति विज्ञान में स्नातक किया और फिर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पोस्ट ग्रेजुएशन। वर्तमान में वे JNU से दक्षिण एशियाई अध्ययन में पीएचडी कर रहे हैं। मनू की सफलता के पीछे सबसे बड़ा योगदान उनकी मां वंदना जैन का रहा, जो एक सिंगल मदर हैं। उन्होंने न सिर्फ पाठ्यपुस्तकों को पढ़कर सुनाया, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी मनू को हमेशा सहारा दिया। मनू ने ब्रेल के बजाय टेक्नोलॉजी ...

"शस्त्र और शास्त्र जिनके लिए वर्जित थे?"

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शस्त्र और शास्त्र जिनके लिए वर्जित थे छीन लिए गए उनसे हर अधिकार, जन्म से पहले ही तय कर दी गई थी हार। ना कलम पकड़ने की आज़ादी, ना तलवार उठाने की इजाज़त। शब्दों के दरवाज़े बंद कर दिए गए, ज्ञान के दीप अंधेरे में रख दिए गए। बचपन से ही सिखाया गया झुकना, सपनों से पहले ही कह दिया – रुकना। वो थे मनुष्य, पर गिने नहीं गए, हिस्से में अपमान, पर इज्ज़त नहीं दी गई। जिन्होंने धरती जोती, फसल उगाई, पर थाली में पहले निवाला उन्हें नहीं मिल पाई। ना वेद पढ़ने का हक़, ना वीणा छूने का अधिकार, ना मंदिर का रास्ता, ना स्कूल का प्यार। कहा गया – "तुम केवल सेवा के लिए जन्मे हो," मानव होकर भी, मानवीयता से वंचित क्यों? लेकिन इतिहास चुप नहीं रहता, कभी न कभी सवाल करता है। वो उठे – कलम लेकर, किताब लेकर, कुछ ने तलवार, कुछ ने विचार लेकर। अब वो खुद अपने इतिहास के लेखक हैं, शस्त्र भी उनके हैं, शास्त्र भी उनके हैं। जो वर्जित था, वो अब अधिकार बनेगा, सदियों की चुप्पी अब हुंकार बनेगा। रचनाकार- अरुण कुमार सिंह 

क्या विकलांगता अभिशाप है?

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क्या विकलांगता अभिशाप है? क्या विकलांगता कोई बोझ है, या समाज की आँखों का खोज है? हम भी तो इंसान हैं प्यारे, क्यों समझे जाएँ हम बेचारे? न ये जीवन कोई अभिशाप है, न ही कोई श्रापित ताप है। हर साँस में उम्मीदों की लौ, हर कदम में संकल्प की थाह। हेलेन केलर—न देख सकीं, न सुन सकीं, फिर भी दुनिया को शब्दों में गुन सकीं। स्टीफन हॉकिंग—शरीर ने साथ छोड़ा, पर ब्रह्मांड का राज़ सबके आगे खोला। जो देख न पाए, क्या वो कम है? उसकी संवेदनाएँ तो असीम हैं। जो चल न सके, क्या वो थम गया? उसका हौसला तो ऊँचाइयों को छू गया। हमें न चाहिए दया की भीख, बस चाहिए अधिकारों की सीख। ना छीनो हक हमें जीने का, ना बाँधो हौसला उड़ने का। कला, विज्ञान, राजनीति में, हम भी चमके हैं धरती के तारे। तो मान लो इस सच्चाई को, विकलांगता नहीं अभिशाप, ये है हमारी पहचान—खास और न्यारी। रचनाकार – अरुण कुमार सिंह

मैं विकलांग हूं, लोग कहते हैं पर..!

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मैं विकलांग हूं, लोग कहते हैं पर..! मैं विकलांग हूं, लोग कहते हैं पर, हौसलों के पंख हैं मेरे, क्यों झुकूं मैं डर? राहों में कांटे मिले, फिर भी मुस्कुराया, गिरा, संभला, खुद को और मजबूत बनाया। जो सोचते थे, मैं थम जाऊंगा, वक्त ने दिखाया, मैं खुद की राह बनाऊंगा। पैरों से नहीं, इरादों से चलता हूं, हर मुश्किल को ताकत में बदलता हूं। हाथ थमे तो क्या, कलम अब भी चलती है, सपने मेरे मेहनत से हर रोज निकलती है। दीवारों को तोड़ना मेरी फितरत है, संघर्ष ही मेरी असली दौलत है। हवा भी पूछे, "तेरी ताकत क्या है?" मैं कहूं, "मेरे हौसले की हर बात निराली है।" मैं रुकने वालों में नहीं, जोश मेरा कम नहीं, मैं वो चिंगारी हूं, जो कभी बुझती नहीं। मत कहो मुझे असहाय, मैं सबल हूं, खुद से लिखी तकदीर का अटल संकल्प हूं। मैं हारा नहीं, मैं झुका नहीं, मैं अपने सपनों की उड़ान हूं, मैं खुद एक पहचान हूं! रचनाकार - अरूण कुमार सिंह 

कब आएंगे साहब, व्हील चेयर लेने के लिए?

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हाल ही में जमशेदपुर सदर प्रखंड में दिव्यांगजनों के लिए व्हीलचेयर वितरण समारोह आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम उन लोगों की सहायता के उद्देश्य से था, जिन्हें अपनी दैनिक ज़िंदगी में चलने-फिरने में कठिनाई होती है। लेकिन यह विडंबना ही है कि जिन दिव्यांगजनों को इस सुविधा की सबसे अधिक आवश्यकता थी, उन्हें समारोह स्थल तक पहुँचने के लिए उबड़-खाबड़ और गिट्टी से भरे रास्तों से होकर गुजरना पड़ा। ✅ सुविधाओं की कमी या प्रशासन की उदासीनता? दिव्यांगजनों के लिए योजनाएं बनाना और उनके अधिकारों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन जब इन्हीं योजनाओं को लागू करने में संवेदनशीलता की कमी दिखाई देती है, तो यह एक गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। जिस कार्यक्रम का उद्देश्य दिव्यांगजनों को सहारा देना था, उसी में उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ा। समारोह स्थल तक जाने वाले रास्तों की दुर्दशा ने प्रशासन की लापरवाही को उजागर कर दिया। व्हीलचेयर जैसे सहायक उपकरण प्रदान करने की पहल सराहनीय है, लेकिन जब बुनियादी सुविधाएँ ही दिव्यांगजनों के अनुकूल न हों, तो ऐसी पहलें अपने उद्देश्य को पूर्ण नही...