"दृष्टिहीनता नहीं, बल्कि दृष्टिकोण मायने रखता है" — मनू गर्ग (IAS) की प्रेरक यात्रा
"दृष्टिहीनता नहीं, बल्कि दृष्टिकोण मायने रखता है" — मनू गर्ग (IAS) की प्रेरक यात्रा
"जब इरादे बुलंद हों तो राहें खुद-ब-खुद बन जाती हैं।" इस कहावत को सच्चाई में बदल कर दिखाया है मनू गर्ग ने, जिन्होंने UPSC 2024 में ऑल इंडिया रैंक 91 हासिल कर यह सिद्ध कर दिया कि दिव्यांगता किसी भी लक्ष्य को पाने की राह में बाधा नहीं बन सकती।
राजस्थान के रहने वाले मनू गर्ग ने कक्षा 8 में अपनी दृष्टि एक दुर्लभ आनुवंशिक रोग के कारण खो दी थी। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। एक दृष्टिबाधित छात्र होते हुए भी, उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से इतिहास और राजनीति विज्ञान में स्नातक किया और फिर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पोस्ट ग्रेजुएशन। वर्तमान में वे JNU से दक्षिण एशियाई अध्ययन में पीएचडी कर रहे हैं।
मनू की सफलता के पीछे सबसे बड़ा योगदान उनकी मां वंदना जैन का रहा, जो एक सिंगल मदर हैं। उन्होंने न सिर्फ पाठ्यपुस्तकों को पढ़कर सुनाया, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी मनू को हमेशा सहारा दिया।
मनू ने ब्रेल के बजाय टेक्नोलॉजी का सहारा लिया—जैसे स्क्रीन रीडर, ऑडियो पीडीएफ, और टेक्स्ट-टू-स्पीच सॉफ्टवेयर। उन्होंने ये साबित किया कि सही संसाधन और मानसिक दृढ़ता हो तो कोई भी असंभव को संभव बना सकता है।
मनू गर्ग का संदेश साफ है—"मुझे सहानुभूति नहीं, समान अवसर चाहिए।" वे विकलांग व्यक्तियों के लिए अधिक समावेशी और समानतापूर्ण व्यवस्था की वकालत करते हैं।
आज जब हम उनकी कहानी सुनते हैं, तो महसूस होता है कि सच्चा संघर्ष शरीर की नहीं, सोच की सीमाओं से होता है।
मनू गर्ग सिर्फ एक IAS अधिकारी नहीं, बल्कि करोड़ों दिव्यांग जनों के लिए एक प्रेरणा हैं।
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