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मार्च, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कब आएंगे साहब, व्हील चेयर लेने के लिए?

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हाल ही में जमशेदपुर सदर प्रखंड में दिव्यांगजनों के लिए व्हीलचेयर वितरण समारोह आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम उन लोगों की सहायता के उद्देश्य से था, जिन्हें अपनी दैनिक ज़िंदगी में चलने-फिरने में कठिनाई होती है। लेकिन यह विडंबना ही है कि जिन दिव्यांगजनों को इस सुविधा की सबसे अधिक आवश्यकता थी, उन्हें समारोह स्थल तक पहुँचने के लिए उबड़-खाबड़ और गिट्टी से भरे रास्तों से होकर गुजरना पड़ा। ✅ सुविधाओं की कमी या प्रशासन की उदासीनता? दिव्यांगजनों के लिए योजनाएं बनाना और उनके अधिकारों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन जब इन्हीं योजनाओं को लागू करने में संवेदनशीलता की कमी दिखाई देती है, तो यह एक गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। जिस कार्यक्रम का उद्देश्य दिव्यांगजनों को सहारा देना था, उसी में उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ा। समारोह स्थल तक जाने वाले रास्तों की दुर्दशा ने प्रशासन की लापरवाही को उजागर कर दिया। व्हीलचेयर जैसे सहायक उपकरण प्रदान करने की पहल सराहनीय है, लेकिन जब बुनियादी सुविधाएँ ही दिव्यांगजनों के अनुकूल न हों, तो ऐसी पहलें अपने उद्देश्य को पूर्ण नही...

क्या विकलांग होना पुनर्जन्म का पाप है?

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👉 क्या विकलांग होना पुनर्जन्म का पाप है? समाज में कई मिथक और अंधविश्वास गहराई से जड़ें जमाए हुए हैं, जिनमें से एक यह धारणा है कि विकलांगता पिछले जन्म के पाप का फल है। यह सोच न केवल तर्कहीन है, बल्कि विकलांग व्यक्तियों के प्रति भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार को भी बढ़ावा देती है। ऐसे विचार समाज में समानता और मानवाधिकारों की अवधारणा के खिलाफ हैं। ✅ विकलांगता के वास्तविक कारण विकलांगता के पीछे कई वैज्ञानिक और चिकित्सकीय कारण होते हैं। इनमें आनुवंशिक विकार, गर्भावस्था के दौरान स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं, दुर्घटनाएं, संक्रमण या पोषण की कमी जैसे कारक शामिल हैं। चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि विकलांगता का पुनर्जन्म या किसी पाप से कोई संबंध नहीं है। यह एक जैविक और सामाजिक वास्तविकता है, न कि किसी पूर्वजन्म के कर्मों का परिणाम। संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित "विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर कन्वेंशन" (UNCRPD) यह स्पष्ट करता है कि विकलांगता सामाजिक और पर्यावरणीय बाधाओं का परिणाम है। यह समाज की जिम्मेदारी है कि वह एक समावेशी वातावरण बनाए, जहां विकलांग व्यक्ति भी सम...

भारतीय रेलवे और दिव्यांगजन का सुगमता?

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यह तस्वीरें भारतीय रेलवे की टाटानगर स्टेशन में "दिव्यांगजन" कोच की वास्तविकता को दर्शाती हैं जबकि यह स्थिति पूरे देश में है। यह कोच भले ही विशेष रूप से विकलांग व्यक्तियों के लिए हो, लेकिन इसमें चढ़ने-उतरने की सुविधा अत्यंत असुविधाजनक है। ✅ मुद्दे: 1. ऊँची चढ़ाई: प्लेटफ़ॉर्म और ट्रेन के प्रवेश द्वार के बीच काफी ऊँचाई है, जो सहायक उपकरण (बैसाखी, व्हीलचेयर) का उपयोग करने वालों के लिए बेहद मुश्किल है। 2. रैंप या लिफ्ट की कमी: दिव्यांगजन के लिए कोई रैंप या स्वचालित लिफ्ट उपलब्ध नहीं है, जिससे स्वतंत्र रूप से चढ़ना असंभव सा हो जाता है। 3. संवेदनशीलता की कमी: 'सुगम्य भारत अभियान' के तहत रेलवे में समावेशी सुविधाएँ उपलब्ध होनी चाहिए, लेकिन यह स्थिति जमीनी हकीकत को उजागर करती है। 📢 क्या भारतीय रेलवे दिव्यांगजन की वास्तविक समस्याओं को समझ रही है? इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि नीति-निर्माताओं तक यह आवाज़ पहुँचे और रेलवे में समावेशी बदलाव हों। #AccessibilityForAll #IndianRailways #DivyangjanRights #सुगम्यभारत #CCPD

न्याय और #हक की लड़ाई में दोस्त!!

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दोस्ती पर एक कविता: न्याय और #हक की लड़ाई में दोस्त!! एक राह के हम मुसाफिर, संग चलने वाले, संघर्षों में अडिग, हौसलों के रखवाले। अरुण की वाणी में हक़ की गूंज, सब के संकल्प से न मिटे कोई मंज़र धुंध। न्याय की राह पर हम सब अटल, हर पीड़ा का रखते हैं हल। जहाँ ज़रूरत, वहाँ आवाज़ बनते, कमज़ोरों के हक़ की पहचान बनते। दुश्वारियों से न डरते, न झुकते, हर तूफान में एक-दूजे का हाथ थामते। हम-सब, संग सदा खड़े, सच और हौसले की जोत जलाए बढ़े। रचनाकार - अरुण कुमार सिंह  #संघर्ष #सत्य #हक़ #न्याय #ArunKumarSingh (यह कविता हम सब #दोस्ती और #न्याय की लड़ाई में साथ देने की भावना को समर्पित है।)

कविता "मैंने जिनके लिए लड़ा"!

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"पिछले 16 वर्षों से न्याय और अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए... **मैंने जिनके लिए लड़ा, वो मेरे अपने नहीं हैं। मैं जिनसे लड़ा, वे मेरे दुश्मन नहीं हैं।। लड़ा हूँ मैं सच के लिए, बस इतना ही मेरा कर्म है। न कोई मेरा था, न कोई पराया, मैंने तो बस हक़ का दीप जलाया।।"** ~~ अरुण कुमार सिंह ~~ #संघर्ष #सत्य #हक़ #न्याय #ArunKumarSingh