मैं विकलांग हूं, लोग कहते हैं पर..!

मैं विकलांग हूं, लोग कहते हैं पर..!

मैं विकलांग हूं, लोग कहते हैं पर,
हौसलों के पंख हैं मेरे, क्यों झुकूं मैं डर?
राहों में कांटे मिले, फिर भी मुस्कुराया,
गिरा, संभला, खुद को और मजबूत बनाया।

जो सोचते थे, मैं थम जाऊंगा,
वक्त ने दिखाया, मैं खुद की राह बनाऊंगा।
पैरों से नहीं, इरादों से चलता हूं,
हर मुश्किल को ताकत में बदलता हूं।

हाथ थमे तो क्या, कलम अब भी चलती है,
सपने मेरे मेहनत से हर रोज निकलती है।
दीवारों को तोड़ना मेरी फितरत है,
संघर्ष ही मेरी असली दौलत है।

हवा भी पूछे, "तेरी ताकत क्या है?"
मैं कहूं, "मेरे हौसले की हर बात निराली है।"
मैं रुकने वालों में नहीं, जोश मेरा कम नहीं,
मैं वो चिंगारी हूं, जो कभी बुझती नहीं।

मत कहो मुझे असहाय, मैं सबल हूं,
खुद से लिखी तकदीर का अटल संकल्प हूं।
मैं हारा नहीं, मैं झुका नहीं,
मैं अपने सपनों की उड़ान हूं, मैं खुद एक पहचान हूं!

रचनाकार - अरूण कुमार सिंह 

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